
हिंदी भाषी प्रदेशों में लोग अपनी मानसिक समस्याओं से निपटने के लिए वैसे तो मनोचिकित्सकों और मनोवैज्ञानिकों के पास बहुत ही कम जाते हैं और इन प्रदेशों में मानसिक चिकित्सा करने वाले विशेषज्ञों का अभाव भी है।
समाज में पागल कहलाने का डर और बदनामी एक ऐसी बड़ी वजह है कि लोग अपनी मानसिक समस्याओं पर किसी से बात करने से भी बचते हैं। वैसे, जब इन मानसिक समस्याओं को झेलते-झेलते उनको डायबिटीज, बीपी, ऑटोइम्यून, आईबीएस जैसी बीमारियाँ घेर लेती हैं तो जरूर वो डॉक्टर से इलाज कराने जाते हैं और समाज में लोग यही जान पाते हैं कि फलाने को शुगर है, बीपी है। फलाने को मानसिक समस्या है, यह कोई नहीं जान पाता।
कई मामलों में डॉक्टर आने वाले मरीज से कहते भी हैं कि स्ट्रेस कम करिए, लेकिन इस एक लाइन से किसी मरीज का स्ट्रेस कम नहीं हो सकता। किसी डॉक्टर के पास इतना समय भी नहीं रहता कि मरीज के जीवन पर लंबी बातें करे क्योंकि स्ट्रेस की जड़ तो मरीज की जिंदगी में होती है, हो सकता है कि इसकी जड़ें बहुत साल पहले बीते बचपन में हों।
लेकिन, वहाँ तक पहुँचने का प्रयास शायद ही कहीं होता है। मानसिक समस्याओं को जिस तरह से हल्के में लिया जा रहा है, इससे आगे चलकर लोगों की औसत जिंदगी और कम होती चली जाएगी।
मानव इतिहास में शुरू से ही मानसिक समस्याओं पर कई तरह से विचार किया गया है। अध्यात्म, मनोविज्ञान, मनोचिकित्सा से लेकर न्यूरोसाइंस तक को करीब से देखने पर यही पता चलता है कि इन सब क्षेत्रों में मानव जीवन के दुखों और मानसिक समस्याओं को कम करने के लिए अपने-अपने नजरिए से काफी काम हुआ है।
लेकिन, अभी तक यह अनसुलझी पहेली ही बनी हुई है कि इंसान की पीड़ा की जड़ तक कैसे पहुँचा जाए? गौतम बुद्ध ने ईसा पूर्व जिस विपश्यना की खोज की थी, आज ढाई हजार साल बाद भी मनोचिकित्सा में उसी विपश्यना के संशोधित रूप माइंडफुलनेस का उपयोग किया जाता है।
पतंजलि ने जिस योग विद्या की खोज की थी, आज उसी को ट्रॉमा के उपचार में उपयोग किया जाता है।
मेरे कहने का मतलब यह है कि पतंजलि या बुद्ध की खोजों के हजारों साल बाद भी मानसिक समस्याओं पर अभी बहुत काम होना बाकी है। अध्यात्म, मनोविज्ञान, मनोचिकित्सा या न्यूरोसाइंस में अब तक हुई खोजों का यही सार नजर आया, ये सभी अंत में अपने विचारों की दिशा बदलने की बात करती हैं।
निर्वाण या मोक्ष की अवधारणाएँ तो जैसे दुनिया की सच्चाई को खारिज करती नजर आती हैं जिसमें आम आदमी रोज-रोज जीता है, इसलिए कभी भी किसी आम इंसान की समझ में यह नहीं आया कि जीते जी कैसे निर्वाण या मोक्ष पाएँ, इसलिए श्राद्ध कर्म जैसे कर्मकांड मरने के बाद मोक्ष पाने की आशा देते हैं।
दूसरी तरफ, मनोविज्ञान और मनोचिकित्सा में इंसान की मानसिक समस्याओं को लेकर ऐसे-ऐसे शब्द गढ़े गए हैं कि जिनको सुनने के बाद ही कई लोग डर सकते हैं। डिसऑर्डर जैसे शब्द दूर से ही डराते हैं और लोग यह कल्पना करने से भी बचते हैं कि उनको कोई डिसऑर्डर है।
अब डॉक्टर तो हमेशा मरीज के साथ रहेगा नहीं। मानसिक समस्याओं का उपचार लंबा समय ले सकता है और मरीजों को तुरंत समाधान चाहिए होता है, इसलिए रोज-रोज होने वाले मानसिक तनावों से निपटने के मामले में ये दोनों विज्ञान भी मुझे अक्षम नजर आते हैं।
हाँ, आपको बड़ी मानसिक समस्या हो जाए, शरीर के लेवल पर ही कोई बीमारी हो जाए तो ये जरूर फायदा पहुँचाते हैं। मैं यहाँ रोज-रोज मानसिक समस्याओं को झेलने वाले आम इंसानों की बात कर रहा हूँ।
दुनियाभर के डॉक्टर अब इस बात पर सहमत हैं कि कई सारी शारीरिक बीमारियों की जड़ें हमारी बरसों की खराब मनोदशा में हैं। क्योंकि, अगर मानसिक रूप से हम स्वस्थ रहते हैं तो बॉडी अपनी देखभाल और मरम्मत का काम खुद ही रोज-रोज करती रहती है, लेकिन यदि हम रोज-रोज मानसिक समस्याएं झेलते हैं, ठीक से खाते-पीते और सोते नहीं हैं तो हमारा शरीर अपनी कोशिकाओं की मरम्मत नहीं कर पाता।
इससे धीरे-धीरे रोगों से बचने की इसकी क्षमता खराब होती चली जाती है और एक दिन बिल्कुल ही खराब हो जाती है, जो शारीरिक बीमारियों के रूप में प्रकट होती है।
बहुत सारे लोग बचपन से ही कोई न कोई ट्रॉमा झेलते रहते हैं और उनकी सेहत को आए दिन कुछ न कुछ होता ही रहता है। लेकिन, वो इसका तात्कालिक उपचार मेडिसिन लेकर करते रहते हैं।
रोज-रोज होने वाली मानसिक समस्याओं को लेकर हम क्या करें, इस मामले में अभी तक कोई पुख्ता तरीका, सिद्धांत, विचार नहीं मिल पाया है; अध्यात्म और विज्ञान, कहीं भी नहीं।
यह मामला अभी भी अनसुलझा है। हम जिन रिश्तों और आर्थिक परिस्थितियों के बीच फंसे रहते हैं, उन झंझावातों के बीच हमारी मनोदशा कैसे ठीक रहे, यह बहुत ही गहरा सवाल है जिससे दुनियाभर के काबिल रिसर्चर जूझ रहे हैं और एक आम इंसान आज भी इस मामले में बेबस है, अपने दर्द को अंदर ही अंदर झेलकर दुनिया से जल्दी निकलता जा रहा है।

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